Sunday, December 13, 2009

माँ

धरा

हल चलाओ देह पर ये धान भर-भर खेत देगी
गोद में सोओ कभी तो माता जैसा हेत देगी
खोदकर देखो इसे धातु के भण्ड़ार देगी
कद बढ़ाने को तुम्हें पैरों तले आधार देगी

शूल छाती में गड़े पर पूत के हित फूल देगी
रात-दिन सूरज जलाये, तुमको शीतल कूल देगी
दर्द खुद के कब सुनाये तेरे आँसू सोख लेगी
चाहियें पर्वत तुम्हें पर अपने सर पर बोझ लेगी

आदमी भी जानवार भी देह पर विचरण करें
ये सभी को धार कर सम प्रेम का वितरण करे
तन के और मनुज के मन का मल सहती रहे
इसकी ममता रात-दिन धारा बन बहती रहे

इसके सीने में समन्दर पाताल बन समा गये
आसमां से जो गिरे सब गोद में समा गये
इसके आँचल में ही सब देवों का अभिसार है
प्रतिकूल को अनुकूल ही मिलता धरा व्यवहार है

आदमी इतना निकम्मा, आदमी कपूत भी
आदमी को आदमी की लगने लगी है भूख भी
आदमी का कृत्य अब इतना भयानक हो गया
गुज़रा कल कहता है, “हाय ! ये क्या ज़माना हो गया”


कल तलक़ जो शांत थी, धीर थी, गंभीर थी
पूरे चराचर में ये पृथ्वी सबसे अधिक अमीर थी
विधि से न टूटा आज भी जिस पर कोई दुःख और है
पर वो धरा भी आज खुद पर रोने को मज़बूर है

3 comments:

श्यामल सुमन said...

भावपूर्ण रचना।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com

परमजीत बाली said...

बहुत सुन्दर भावपूर्ण रचना है।बधाई।

अजय कुमार said...

धरती की महत्ता और उसकी वेदना की अच्छी प्रस्तुति