Friday, April 24, 2009

वोट भले को देना है!

वोट जरूर डालें
समाज के जिम्मेदार लोगों में राजनेताओँ को छोड़ दीजिये क्योंकि वे तो चुनाव लड़ रहे हैं, लड़ा रहे हैं अतः कहेंगे ही कि वोट जरूर डालें और हमको ही डालें। उनसे ज्यादा पूछताछ करोगे तो वो यह भी कह देंगे कि जो हमको वोट नहीं दें वे लोग वोट न डालें।

मैं बात करना चाहता हूँ समाज के अन्य उत्तरदायी समूहों की जिनमें लोकतंत्र का चतुर्थ स्तंभ मीडिया है बुद्धिजीवी हैं, समाज सेवी हैं, कलाकार हैं, गाडी के नीचे चलने वाले और भी बहुत हैं। ये सब मतदाता से कह रहे हैं कि उसे वोट जरूर डालना है ओर किसको डालना है! जो स्वच्छ छवि का उम्मीदवार हो, ईमानदार हो, पढ़ा-लिखा हो, काम कराने वाला हो, उसकी सुनने वाला हो, जाति-पाँति, धर्म-सम्पद्राय से ऊपर हो, आपकी पहुँच में रहता हो। वे कह रहे हैं कि यदि उसने वोट नहीं डाला तो लोकतंत्र का असली हत्यारा मतदाता ही है। कुछ संगठन, जिनमें अखबार मुख्य हैं, तो अभियान भी चला रहे हैं, वोट के लिये वोट डलवा रहे हैं, रैलियाँ निकाल रहे हैं। इनके अपने संसाधन हैं तो खबर भी खुद ही दे रहे हैं, इनके पास वही भीड़ इकट्ठी हो रही है जो मदारी के पास भी हो जाती है। ये अखबार बार-बार ऐसे समाज सुधारू काम करते ही रहते हैं, मतलब समाज सेवा, जागरुकता आदि। बात वोट की ------
अब इस हो-हल्ले में एक ढीठ मतदाता, जिसका इन अभियानों ने अंतःशुद्धिकरण कर दिया है और वो उठ खड़ा हुआ है, लोकतंत्र की खातिर वोट जरूर देगा। मतदान के दायित्व के बोझ से दबकर अपना कंधा ऊँचा कर दिया है अर्थात गाड़ी को उँच लिया है। गाड़ी के नीचे वालों को इसका पता ही नहीं चला, क्योंकि गाड़ी पहले भी उनको नहीं छू रही थी। तो गाड़ी को उँचकर ढीठ मतदाता पूछ बैठा- बताओ भई वोट अ को दूं कि ब को दूं ?
जिम्मेदारों को प्रश्न नागवार लगा – कहा न भले को दो
मतदाता – मेरे सामने अ है, ब है, स है, द है, भला कोई नहीं है
जिम्मेदार – अरे इन्हीं में से भले को दो इतने इशारे कर दिये फिर भी........ घोंघू कहीं का
मतदाता – तो बताओ अ भला है, कि ब भला है, कि स भला है, कि द भला है
जिम्मेदार – यह भी अब हम बतायें ( और वे फिर इशारे करने लगे)
मतदाता को गुस्सा आ गया – सालो क्या लुच्चों और रण्डियों की तरह इशारे कर रहे हो, मुंह से बोलकर, हाथ लगाकर कहो कि इसको देना है (वास्तव में अब उसको लोकतंत्र की चिंता हो गई थी, और ऐसों के भरोसे तो लोकतंत्र डूब सकता था)
--- मामला गंभीर होता देख जिम्मेदार इकट्ठे हो गये, मुंह लटक गये सबके, मंत्रणा करने लगे, क्या करें बता दें – किसको देना है वोट! एक जिम्मेदार ने सुझाया—उसको बताओ या न बताओ पहले अपने बीच में तो तय करलो भला कौन है? पेच फंस गया कोई भी जिम्मेदार किसी एक को भला नहीं कह सकता था, किसी एक को भला बताना जिम्मेदारी के सिद्धांतों के खिलाफ है, और अ, ब, स, द में से किसी एक का पक्ष लेना लोकतंत्र के खिलाफ है, पेच बिल्कुल फंस गया था, वैसे बुद्धिवाद अब भी उतना ही स्पष्ट था कि वोट तो भले को ही देना चाहिये, और वोट तो जरूर देना चाहिए, इसमें कोई संशय नहीं था, लेकिन पाला एक गंवार किस्म के वोटर से पड़ गया था जो इशारों में नहीं समझ रहा था, जिम्मेदारों में बुद्धिवाद का दूसरा मुद्दा हावी हो गया कि जब आदिम भाषा ही इशारों की रही है तो कोई मनुष्य भला इशारों की भाषा में क्यूँ नहीं समझ रहा है, उन्होंने इस पर गंभीर चिंतन, वाद-विवाद, खोज-बीन करने के बाद तय किया कि वोटर उन्हें उल्लु बनाना चाह रहा है, वह इशारों की भाषा समझता है, लेकिन जानबूझ कर अनजान बन रहा है, वह मतदाता नहीं किसी बेईमान, भ्रष्ट और अपराधी उम्मीदवार का एजेण्ट है। लेकिन कुछ भी हो उन्होंने तय किया कि उसका सामना यदि नहीं किया गया तो यह न केवल लोकतंत्र की परोक्ष हार होगी, बल्कि समाज विरोधी तत्व हावी होंगें, उनकी चालाकियां, जो अभी यह मतदाता बहुत निपुणता से कर रहा है, सफल हो जायेंगी, अंततः इससे मानवता को नुकसान होगा जिसका जिम्मेदार बुद्धिजीवी समाज होगा- अतः उस चालाक के प्रश्न का जवाब देने, उसका सामना करने, वैसे वह वास्तव में चालाक भी नहीं घोंघू है चालाक तो वह बन रहा है कि भावना से एक सबसे जिम्मेदार बुद्धिजीवी को, जो आरोपों को हंसकर, गांलियों को ठहठहाकर सह सकता था, विपरीत परिस्थियों में भी संयत रह सकता था और शांति के सिवा जिसका कोई विचार नहीं था, उस ढीठ मतदाता के पास भेजा गया, जोकि मामले को सुलझाकर आयेगा।

उसने जाते ही कहा – देखिये मतदाता जी मैं मानता हूँ कि आपका प्रश्न अपनी जगह जायज है, मैं यह भी मानता हूँ कि........... वैसे आप भी बखूबी जानते हैं कि भला कौन है, बुरा कौन है, आप तो बस यूँ ही पूछने के लिये पूछ रहे हैं अन्यथा आपसे बेहतर भला कोई दूसरा कैसे जान सकता है कि भला.... ....आखिर आप देश के जागरुक, होनहार, दूरदृष्टा मतदाता हैं, देश आप लोगों के दम पर चल रहा है बल्कि मैं तो यह भी कहूँगा कि ये जो तमाम तरह की प्रगति, बदलाव हमारे देश में आज आया है, सब आपकी वजह से ही है, वरना तो राजनेताओं को तो कौन नहीं जानता ( हमारे सिवा) हम तो यहाँ वैसे भी नये हैं फिर हमारे लिये तो कोई क्या बुरा होगा, क्या भला होगा, हम भी किसी का क्या करते हैं, हम देश में बोलने की आजादी, कार्यक्रम करने, आप लोगों की सेवा करने की कामना आदि के अतिरिक्त चाहते भी क्या हैं, सब कुछ आपके लिये ही तो है। फिर भी मै कहूँगा आपका गुस्सा जायज है लेकिन आप इस गुस्से का सटीक इस्तेमाल कीजिये, गुस्सा भी अपनी जगह बड़ी काम की चीज है, और आप वोट जरूर डालें, और भले को ही डालें, हमारा तो सबका आपसे यही निवेदन है, बाकी कानूनन तो ऐसी कोई बाध्यता भी नहीं है, और हम तो सिर्फ जागरुक ही कर सकते हैं।
इसका प्रत्यक्ष प्रभाव यह हुआ कि मतदाता शांत हो गया
मतदाता--- तो आप भी नहीं जानते कि भला कौन है! फिर क्यूँ टर्र-टर्र लगाये फिरते हैं? (उसने बिना गुस्से के ही कहा)
बुद्धि जी ने बिना विचलित हुए ही कहा- अब भी आप बहुत गलत भाषा का प्रयोग कर रहे हैं, ऐसे तो बातचीत नहीं की जा सकती ( और हें हें हें... किया)
मतदाता-- आप व्यर्थ ही डर रहे हैं, मैं कोई गुण्डा नहीं हूँ, और अब आपसे बातचीत भी क्या करनी जब आपको भी पता नहीं कि भला कौन है।
बुद्धि जी—देखिये यह तो आप गलत कह रहे हैं बातचीत तो जारी रखना जरूरी है, बातचीत इस दृष्टि से भी जरूरी......
मतदाता--- आप चुप रहें। देखिये मेर सामने अ है, ब है, स है,................ सब कह रहे हैं मैं भला हूँ, मै भला हूँ चिल्ला-चिल्ला कर कह रहे हैं
बुद्धि जी ---- देखिन उन के कहे पे मत जाइये---
मतदाता – आप चुप रहें। कहे पर तो मैं आपके भी नहीं जाता। लेकिन मुझे लगा आप इतना हल्ला कर रहें हैं तो आपको पता होगा भला कौन है। आखिर मुझे चुनाव तो अ, ब, स, द, में ही करना है न, मैं यह कह कर तो नहीं आ सकता न कि मेरा वोट भले को जायेगा।
अब आप कुछ मत बोलिये और चले जाइये। बस जाइये।

बुद्धि जी लौटे

जिम्मेदार समूह---- क्या हुआ?
बुद्धि जी (मुस्कुराये, पर्याप्त समय लिया) – यह जिम्मदार समूह की जीत का दिन है।
----- कैसे! क्या आपने भले का चुनाव कर दिया( समूचा समूह तमतमाया) ?
-------- नहीं हम भला ऐसा गैर जिम्मदाराना काम कैसे कर सकते थे, वह भी तब जब आप सबने हमें इतना बड़ा जिम्मा दिया, हमपर विश्वास किया। बल्कि हुआ यह है कि अब उसने विचार करना शुरु कर दिया है। वास्तव में वह चालाक नहीं है घोंघू ही है। लेकिन अब वह विचार करना शुरू कर चुका है तो वोट जरूर देगा और भले को ही देगा, हमें यकीन है।
(सभी जिम्मेदार एक दूसरे को तालियाँ मार कर उछले-कूदे)

मित्रों मतदाता भले का चुनाव नहीं कर पा रहा है, उसने सब तरह से परखा, जिस पर आरोप हैं उस पर झूठे हैं, जिस पर नहीं हैं उसपर मुकदमे दर्ज ही नहीं होते। जो पढालिखा है बेइमान है, जो अनपढ है वह गुण्डई करता फिरता है। अन्ततः उसने चुनाव किया कि कौन है जिसके होने से उसे राशन की लाइन में नहीं लगना पडेगा, उसके घर जब जरूरत हो गैस सिलेण्डर भिजवा देगा, वह सीधे खुद का परिचित नहीं तो परिचित का परिचित सही, नहीं तो अब कर लेंगें चापलूसी , जो अपना है वही भला है।

3 comments:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

आप का हिन्दी ब्लागिंग में स्वागत है। आप वर्ड वेरीफिकेशन हटाएं। टिप्पणी करने में परेशानी होती है। आज का आलेख बहुत सही है। हमारी चुनाव प्रणाली तमाम सुधारों के उपरांत भी ऐसी हो गई है कि उस में सही को चुन पाना संभव नहीं है। उसे बदलने की जरूरत है। लेकिन उसे बदलने के लिए भी संसद की आवश्यकता है जहाँ पहुँचाने के लिए सही व्यक्ति नहीं मिल रहा है। इस लिए जनता को संगठित होना पड़ेगा आंदोलन उठाना पड़ेगा। वर्तमान सत्ता को मजबूर करना पड़ेगा।

प्रीतीश बारहठ said...

लेकिन द्विवेदी जी आंदोलन तो इन्हीं को वोट देने के लिये किया जा रहा। और अपनी पीठ भी थपथपाई जा रही है। आम मतदाता के सामने समस्या किसी एक का चुनाव करना है, बुद्धिजीवी उसकी दुविधा को कम करने के बजाय बढ़ा रहा है।

अनिल कान्त : said...

waah kya baat hai
aapne sahi prashn uthaya hai