Tuesday, February 2, 2010

प्रेम तो है मर्ज़ मेरा

प्रेम तो है मर्ज़ मेरा




1. वो तो निकला है गगन में

धूप से सबको बचाने

तुम न देखो जो उसे

उसको नहीं नखरे उठाने

वो है निश्छल सबका प्यारा

और सब उसको हैं भाये

खुद को दुनिया से बचाकर

कौन ऐसा चाँद होगा

जो कि तुझको ही लुभाये

जो कि तुझको ही रिझाये



2. ये हवायें टूटती है

पर्वतों के पार से

हर चमन के गुल खिले हैं

एक ही बहार से

इसमें ही लोरी गूंजती है

ये ही आतुरता जगाये

तेरे आँचल का सरीखा

कौनसा मधुमास होगा

जो कि मुझको ही सुलाये

जो कि मुझको ही बुलाये



3. उसकी किरण से दीप्त है

संसार का हर-एक कण

जन्म से सोया नहीं

जो कभी भी एक क्षण

उसके पावन कर्म का

मोल कौन, क्या चुकाये?

कर विचार! सूर्य भी

क्या दीप की मानिंद होगा

जो कि तुझको ही दिखाये

जो कि तुझको ही पढ़ाये



4. मेरा ये उपक्रम है ऐसा

जो चुकादे कर्ज़ मेरा

इस हृदय से उस हृदय तक

प्रेम तो है मर्ज़ मेरा

मैंने तेरे सामने भी

बैठकर आंसू बहाये

मैने सोचा ही नहीं है

मेरा ऐसा प्यार होगा

जो कि केवल तुमको पाये

जो कि सबको भूल जाये

4 comments:

अमिताभ श्रीवास्तव said...

prem marz bhi hota he??par rachna marz ki davaa jyada lagti he..shbdo ke malham se sukoon miltaa he.

वन्दना अवस्थी दुबे said...

बहुत सुन्दर कवितायें.

Udan Tashtari said...

बहुत बढ़िया. आनन्द आया पढ़कर.

मेरा ऐसा प्यार होगा
जो कि केवल तुमको पाये
जो कि सबको भूल जाये

रंजीत said...

भाव से भरी , गाने योग्य कविता। बधाई।