Friday, March 5, 2010

खूंटी

खूंटी


अपने ही खण्डहर में
खोजते हुए वास्तुकला
मैं पा जाता हूँ अपना भव्य अतीत
जिसके स्मति सुख में
जीत लेता हूँ वर्तमान की प्रत्येक चुनौती

प्रगति की चाह में
जहाँ गिरा था लड़खड़ाकर
और तब्दील हो गया था अपने मकबरे में
मैं कामयाब हो सका एक स्वप्न देखने में
जिसमें उभरीं एक-इक कर पिछली घटनायें
जो कुछ तहों के बीच धुंधली अवश्य हो गयी थीं
मगर थीं सुरक्षित

विगत आज भी था तैयार हर अनागत के स्वागत को
अगर मैं लौट सकूं !!!

कह रहा था अतीत मेरा “असम्भव सदा असम्भव रहा है
तुम नहीं लौट सकोगे, रुके रहे तो हो जाओगे अतीत
 ढूँढ़ो अपने मंदिर की नींव”

मैं मुश्किलों से हो जाता हूँ तैयार
करने को वही उपक्रम
जो हारे को साबित करता है विजेता

नींव का मिलना आज भी उतना ही सहज है मेरे देश में
लेकिन उठती हुई दीवार की ईंट पहचानने के लिये
अपेक्षित है एक प्रस्तर-भेदी दृष्टि

जो समाहित होती है मेरी आँखों में कौंधकर
छूते ही एक जाना-पहचाना-सा स्पर्श
किसी टूटी हुई चिकनी वस्तु पर
जिसकी चुभन रक्तस्राव के लिये चीर तो दे नसें
लेकिन न दे कोई पीड़ा, न दे आह

फिर न पड़े किसी आह पर किसी महल की नींव

धिक्कार! यदि वहाँ पहुँचकर भी मैं ढूँढ़ता हूँ वही खूंटी
जिसपर टांगते आये हैं हम वर्षों से आदर्श

1 comment:

सुलभ § सतरंगी said...

प्रभावशाली रचना. आत्ममंथन करती हुई.