Monday, March 8, 2010

गलत नहीं हैं लालू-मुलायम

इन दिनों महिला आरक्षण बिल का विरोध कर रहे लालूप्रसाद यादव और मुलायमसिंह यादव की छवि विलेन की सी बनाई जा रही है। कहा तो यह भी जाता है कि महिला आरक्षण बिल के साथ समर्थन और विरोध करने वाले सभी पुरुष राजनीतिज्ञों की आपसी सहमति के तहत यह नाटक किया जाता है, ताकि बिल लटका रह सके और पुरुषों का वर्चस्व बना रहे। खैर! पर्दे के पीछे क्या है ? इसे तो ज्ञानी लोग ही जानते होंगे। लेकिन लालू-मुलायम-शरद द्वारा किया जा रहे ऐतराज़ मुझे सही जान पड़ता है। मुझे यह भी आश्चर्यजनक लगता है कि इन नेताओं की बात मानने में सरकार या प्रधानमंत्री को क्या अड़चन है ! यदि महिला आरक्षण के भीतर एस.सी, एस.टी, अल्पसंख्यक, दलित, ओबीसी आदि का कोटा निर्धारित किया जाता है तो कांग्रेस-भाजपा को क्या आपत्ति है और क्यूँ है। क्या इसलिये कि संसद में सवर्ण महिलायें इसे स्वीकार कर रही हैं और पिछडे़ वर्गों की महिलायें प्रभावहीन हैं?  एक लचर-सा तर्क दिया जा रहा है कि महिला एक ही वर्ग है उसे बाँटो मत। तो जनाब! जो समान्य आरक्षण है उसमें क्या उन्हें पहले सी नहीं बांट रखा है। और यह बंटवारा क्या उनके रिश्तों का बंटवारा है ? यदि दलित महिलाओं का कोटा निर्धारित नहीं किया जाता है तो यही संभावाना ज्यादा है कि कांग्रेस-भाजपा की सवर्ण महिलायें और प्रभावशाली नेताओं की रिश्तेदार ही इस आरक्षण का फायदा उठाती रहेंगी। मुझे लालू-मुलायम-शरद की आपत्ति तो समझ में आती है लेकिन सरकार द्वारा उसे नहीं मानने के कारण समझ नहीं आते, आखिर कांग्रेस-भाजपा क्यूँ दलित और पिछड़ी महिलाओं को आरक्षण नहीं देना चाहती ? होना तो यह चाहिये कि समस्त प्रकार के आरक्षण में क्रीमीलेयर सीमा भी निश्चित कर देनी चाहिये। अब बिल की स्थिति यह हो गई है कि वह हंगामें की भेंट चढ़ गया है, बावजूद इसके पास हो सकता है लेकिन एक और जुगलबंदी हो गई है। कांग्रेस के पास बहाना है कि बहस होना संभव नहीं है इसलिये इसे बिना बहस के पास किया जाये। भाजपा के पास बहाना है कि बिना बहस के समर्थन नहीं करेंगे। कांग्रेस नीत सरकार आसानी से बहस करवा सकती है, भाजपा को बिना बहस क समर्थन करने में कोई दिक्कत नहीं आनी चाहिये, आखिर सासंदों के वेतन-भत्ते बढ़ाने के बिलों पर कितनी बहस होती है? सरकार चाहे तो यादवों की बात मानकर इस बिल को सर्वसम्मत्ति से पास करवाकर इतिहास रच सकती है। अर्थात यह बिल हर तरह से पास हो सकता है। लेकिन नहीं होगा। पूछिये क्यूँ... ? सभी दलों को महिलाओँ के वोट चाहियें उनका शासन नहीं ।

5 comments:

रंगनाथ सिंह said...

मुझे लगता हे कि महिलाओं में विभेद नहीं होना चाहिए। मुझे पुर्नविचार करना होगा। खैर,बहस हो तो विभिन्न मत सामने आएं।

प्रीतीश बारहठ said...

Sir,
प्रथम, तो यह है कि पूर्व से जो आरक्षण है उसमें यह भेद(अगर भेद माना जाये)तो पहले से मौजूद हैं, जो सीट एस.टी. के लिये आरक्षित है वहाँ से कोई एस.टी. की महिला तो चुनाव लड़ सकती है सामान्य नहीं। नौकरी में तो बाकायदा एस.सी, एस.टी, ओ.बीसी, महिला का आरक्षण प्रतिशत निश्चित है। हम आरक्षण को सिद्धान्ततः भेदकारक मानते भी नहीं हैं।

दूसरा, इसका परिणाम क्या होता है ? आज कितनी ऐसी सीट हैं जहाँ वर्गवार आरक्षण होने पर महिलायें जीत कर आती हैं। उन सब सीटों का लाभ उस वर्ग के पुरूष ही उठाते हैं। यही इसमें होगा संसद में महिला आरक्षण का कोटा सिर्फ सवर्ण महिलाओँ द्वारा भर दिया जायेगा।

तीसरा, दलित-महिला वर्ग में राजनीतिक आरक्षण से कारण स्थितियाँ तेज़ी से बदलती हैं। राजस्थान में पंचायत चुनावों में महिला आरक्षण है। इसके चलते मजबूरन दलित महिलाओं को वार्ड पंच, सरपंच, प्रधान, जिला प्रमुख चुनना ही पड़ता है। ये महिलायें अपने प्रथम कार्यकाल में चाहे घूंघट में ही रहती हों, चाहे इनके पति और रिश्तेदार ही सारे अधिकारों का उपयोग करते हों। लेकिन पांच वर्ष के अन्तराल में वे मुखर होने लगती हैं, इन घरों और आसपास के गाँवों तक में लडकियों को पढ़ाया जाने लगता है, जनसंख्या पर नियन्त्रण हो जाता है, पाँच-छह साल का जनप्रतिनिधित्व मिलने के बाद वे महिलायें असहाय नहीं रह जाती हैं और उनकी अपनी जमीन पैदा होती है। अपने दूसरे कार्यकाल में शायद ही कोई महिला किसी मिटिंग में अपने पति को साथ ले जाती हो। वे सार्वजनिक मंचों से भाषण करने लगती हैं। परिवार और समाज में औरत के प्रति मर्दों का नजरिया सकाराक्तक होता है। हम सोच सकते हैं २० वर्ष बाद ये महिलायें कितनी सशक्त हो जायेंगी। इस उत्थान की सबसे अधिक जरूरत दलित महिलाओं को है, जिससे यह बिल उन्हें वंचित करता है।

Fauziya Reyaz said...

aapki baat s sehmat bhihoon aur asehmat bhi...

asal mein sab raajniti hai...congress ko apna faida nazar aata hai bhajpa ko apnaaur lalu mulayam ko apna faaida nazar aata hai...
auraton ke utthan mein koi bhi interested nahi hai

Mired Mirage said...

इसीलिए सारी आरक्षित सीटों में आधी उस वर्ग की स्त्रियों के लिए आरक्षित करिए। चाहे नौकरी हो , पढ़ाई या चुनाव।
यह कैसा लगेगा नेता जनों को?
घुघूती बासूती

रंगनाथ सिंह said...

प्रीतीश जी

अभी तक मैंने इस विधेयक का प्रारूप देखा नहीं है। देखे बिना ज्यादा कुछ नहीं कह सकता। आपने जो बात रखी है वह सही है। मैंने पुर्नविचार की बात पहले ही कही है।