Saturday, March 20, 2010

ग़ज़ल

कहता रहा हूँ आजतक, ‘बेरोज़गार हूँ’
करता रहा हूँ ज़ुल्म, मैं सितमगार हूँ

रोने से मिल जाती है मेरे पेट को ठंड़क
भूखा नहीं हूँ आजकल बारोज़गार हूँ

इज़्ज़त से होता हूँ बरी हरएक दफ़्तर से
देखिए तो! मैं भी कैसा गुनहगार हूँ

चिथ के मर गया हूँ, लाइन में हूँ मगर
पहले से ही मैं बहुत ख़बरदार हूँ

करता फिरूँ हूँ दर-ब-दर तीरथ-सा एक मैं
पापियों में मैं बड़ा ही होशियार हूँ

जानता हूँ आपकी मज़बूरियों को मैं
आपसे ये अर्ज़ करके शर्मसार हूँ

छोड़ दीजिये मुझे फुंफकार से डराना
ज़हर भी बाँटोगे तो उम्मीदवार हूँ

जब से सुना है मेरी ख़ातिर परेशान हो
तुमसे मिलने का भी तो तलबगार हूँ

‘वाह-वाह’ करते हैं सुनकर सफ़र का हाल
ख़ाके-राह हूँ, कि मैं ग़ज़लगार हूँ

2 comments:

वीनस केशरी said...

सुन्दर भावाभव्यक्ति
आख़री के तीन शेर खास पसंद आये
-वीनस

दिगम्बर नासवा said...

अलग हट कर लिखे अच्छे शेर हैं ....... सुंदर अभिव्यक्ति ....