Thursday, March 11, 2010

हूसैन मेरी आँख में !

मैं एक आस्तिक हूँ। परंपरा और संस्कार से हिन्दू पद्धतियाँ ही मुझे मिली हैं, मैं पूजा-पाठ करने वाला व्यक्ति भी हूँ। मैं किसी भी कला के बहाने से सरस्वती का नग्न चित्रण स्वीकार नहीं कर सकता। जाहिर है, हूसैन से मुझे भी शिकायत ही है। लेकिन मैं विरोध में अपने स्थान से खड़ा होना तो दूर गहरा सांस भी नहीं खींच सकता। हाँ अपने विचार किसी भी मंच पर रख सकता हूँ। जवाब धैर्य से सुन सकता हूँ।

आजकल ब्लाग जगत में वैसे भी हूसैन पर आर्टिकलों की बाढ़-सी आयी हुई है, खण्डन – मण्डन पूरे जोर-शोर पर है। कुछ लेख पढ़े हैं, वहाँ आई भावनावादियों की असंयमित टिप्पणियां भी पढ़ी हैं। एक ब्लाग पर हमारे एक तेजस्वी मित्र की टिप्पणी भी पढ़ी। उनकी मेधा, ईमानदारी और तर्क पद्धति के कारण सामान्यतया उनसे असहमत होने से पहले सौ बार पुनर्विचार करने की आवश्यकता होती है। लेकिन इस विषय पर वे भी हूसैन वादियों के समर्थन में हैं और मुझे उनसे सहमत होना संभव नहीं हो रहा है। इसलिये मैनें भी बार-बार अपने को खंगाला है। मुझे लगता है एक तरफ हिन्दू कट्टरवाद और उसके समर्थकों तथा दूसरी और हूसैनवादी प्रगतिशीलों के अरण्यरोदन में एक आम भारतीय, एक आम हिन्दू का प्रश्न पददलित हो रहा है। यह एक सामयिक प्रसंग है, मेरे जैसे व्यक्ति कुछ करने की स्थिति में नहीं है लेकिन यह अपनी जड़ताओं को खोलने, खंगालने का एक अवसर है। हमारे प्रगतिशील विचारों (जो इन दिनों बहुत जड़ हो गये हैं और अपनी दिशा निरंतर खोते जा रहे हैं) को भी ठोक-बजाकर देख लेने का अवसर है। दरअसल यह एक ऐसा मुद्दा है जिस पर बात करते हुए दोनों ही पक्ष उत्तेजित से हो जाते हैं इसलिये विमर्श में कहीं कुछ अतिशयोक्तिपूर्ण निष्कर्ष निकल आते हैं। मैंने बहुत पहले ‘वह’ चित्र किसी साहित्यिक पत्रिका में देखा है, पहले से सुन भी रखा था। उसे देखकर न मुझे क्रोध आया, न उग्र हुआ, न भावनाओं में उबाल आया, न जुगुप्सा हुई, बस एक कटु मुस्कान चित्रकार पर आयी और एक हल्का-सा क्षोभ मैंने महसूस किया, मुझे वह भद्दा चित्रण लगा। मेरे लिये वह मात्र मुंह फेरलेने वाला चित्र था। इससे अधिक कुछ नहीं। सब लोगों के साथ ऐसा हो तो शायद दुनिया को बहुत सी अतिवादी समस्याओं से छुटकारा मिल जाये। (लेकिन सभी लोगों को की भावना और आस्था का पैरामीटर एक-सा तो नहीं होता)। राजेन्द्र यादव जी से एक सभा में उस चित्र का संदेश भी समझा है। चित्र में सरस्वती (औरत आकृति) के हाथ में वीणा है, एक हाथ में पुस्तक है पीछे से शेर उन पर हमला करने वाली मुद्रा में है और साथ ही इस औरत आकृति के गुप्तांग को रेखा द्वारा उकेरा गया है। वस्त्र नहीं हैं, नीचे लिखा है सरस्वती। राजेन्द्र जी ने बताया कि सरस्वती अर्थात हमारी वाणी, शेर अर्थात पशु, एक पशु हमारी वाणी पर हमला कर रहा है। हिन्दू धर्म में सरस्वती को विद्या की देवी माना गया है। चित्र में यही दिखाया गया है। भारतमाता का चित्र मैंने कभी देखा नहीं है। इसके अलावा यही है कि कट्टरपंथी इसे लेकर उग्र हैं और दूसरा पक्ष यह कहता है वे कला को नहीं समझते और यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मामला है। हूसैन इन दिनों कतर की नागरिकता ले चुके हैं इसलिये यह मुद्दा एक बार फिर चर्चा में आया है, वे बहुत पहले ही इसी मामले के कारण देश छोड़ गये थे। नाम से ही जाहिर है कि वे मुसलमान हैं और चित्र का विषय हिन्दू देवी सरस्वती हैं, मामले में कट्टरों के पास यह भी एक मसाला है। बहस में दोनों पक्षों द्वारा दिये जा रहे मुख्य-मुख्य तर्क अब आम जानकारी में आ चुके हैं, अर्थात प्रकरण से पूरा पर्दा हट चुका है।

मामला कानून और संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा हुआ है। अभिव्यक्ति की आजादी एक मौलिक अधिकार है। इसके तहत मैं समझता हूँ कि एक भारतीय किसी मुद्दे पर अपनी राय रखने, किसी निर्णय का तर्क संगत विरोध करने, अपनी इच्छाओं को जाहिर करने का, अपने विचारों को लिखित – मौखिक रूप से सार्वजनिक करने का मूलभूत अधिकार रखता है। इसमें कलायें भी शामिल हैं। लेकिन इसके लिये क्या कोई व्यक्तिगत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता शामिल है ? ये दोनों अलग-अलग हैं या एक हैं? उदाहरणार्थ मैं कहूँ कि देश में भ्रष्टाचार है, कालाबाजारी है और दूसरा मैं कहूँ कि श्री “अ” बहुत भ्रष्ट हैं, वे कालाबाजारी करते हैं तो क्या ये दोनों बातें एक ही अधिकार के अन्तर्गत आती हैं या अलग-अलग हैं? मुझे लगता है दूसरी बात में मुझे सबूत के साथ सामने आना पड़ेगा वरना मानहानि का मुकदमा झेलना पड़ेगा। मि. ‘अ’ के भी कुछ सवैंधानिक अधिकार हैं। दूसरा, देश सवैंधानिक रूप से धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है लेकिन किसी भी भारतीय को अपनी आस्था के अनुसार धर्म को मानने, पूजापाठ करने, अपने धर्म का प्रसार-प्रचार करने का हक़ भी देता है। अर्थात धार्मिक आस्थायें रखने का हक भी सवैंधानिक है। जाहिर है जो हक है उसमें यदि कोई बाधा पहुँचाई जाती है तो न्याय मांगने का अधिकार भी दोनों पक्षों को स्वतः मिल जाता है।

हालांकि हूसैन किस देश के नागरिक हों यह उनका निजी मामला है इसकी उन्हें पूरी आजादी है लेकिन यदि वे अपनी आयु को देखते हुए अदालती मामलों की परेशानी से (न्याय से नहीं) बचने के लिये गये हैं तो यह देश के लिये लज्जाजनक बात है यहाँ की न्याय व्यवस्था को अधिक उम्र के व्यक्तियों को न्याय सुलभ करवाने के लिये अधिक सुविधाजनक होना चाहिये। आखिर हर वृद्ध व्यक्ति तो देश छोड़कर नहीं जा सकता है। वृद्ध व्यक्ति के प्रतिकूल न्याय व्यवस्था के कारण यदि एक विश्व प्रसिद्ध प्रतिभा देश छोड़ जाती है तो सरकार को इस पर सोचना चाहिये और कुछ सुधार करने चाहिए। फिर भी यदि हूसैन कट्टरपंथियों के डर से गये हैं तो यह देश के लिये और भी शर्म की बात है। यदि सरकार अरबपति और प्रसिद्ध हस्ती हूसैन को सुरक्षा नहीं दे सकती, कट्टर पंथियों पर लगाम नहीं लगा सकती तो आम आदमी को कितनी सुरक्षा देती होगी उसे खुद ही सोच लेना चाहिये!

दूसरा पक्ष जो कहता है उस दृष्टि से भी घटना का विश्लेषण तो होना चाहिये कि हूसैन इस दैन्य का प्रदर्शन वे अपनी मार्केट वैल्यू बढ़ाने के लिये कर रहे हों, मुद्दा ज्वलंत रखने के लिये कर रहे हों, इस शक का भी कोई निदान आना तो चाहिये। इस विवाद के कारण हूसैन की प्रसिद्धि में जो इज़ाफ़ा हुआ है। उनकी पेंटिंगस् की कीमत बढ़ी है उससे उनको कितना आर्थिक लाभ हुआ है। आखिर यह कोई अनहोनी घटना तो नहीं है, ऐसे बहुत से विवाद है जिनसे कलाकार सुर्खियों में आते हैं, कट्टर पंथियों के वोट बढ़ते हैं दोनों ही लाभ में रहते हैं और देश के संसाधन बर्बाद होते हैं। आम आदमी को कष्ट पहुँचता है। बहुत से विवाद प्रकाश में हैं जिन्हें कूटनीति की तरह पैदा किया गया। कुछ का तो यहाँ तक कहना है कि हूसैन जैसे अमीर के लिये अदालतों के चक्कर लगाने की या स्वयं की सुरक्षा की कोई परेशानी भारत में हो ही नहीं सकती।

कुछ के अनुसार हूसैन ने कथित रूप से सरस्वती का नग्न चित्र बनाया है। यहाँ यह कथित शब्द अनावश्यक है। चित्र में केवल वीणा और पुस्तक ही इस बात के सबूत नहीं हैं बल्कि नीचे सरस्वती लिखा भी गया है फिर हूसैन ने कभी अस्वीकार भी नहीं किया कि यह चित्र उन्होंने नहीं बनाया और यह सरस्वती का चित्र नहीं है। शीर्षक शब्दों में अवश्य “नग्न सरस्वती” नहीं दिया गया है लेकिन गुप्तांग की आकृति उकेरी गयी है, वस्त्र नहीं है और सरस्वती लिखा गया है इसलिये मामला तो बिल्कुल वही है। दूसरा सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न है कि यह मुद्दा कैसे बना? चित्र बनने के छब्बीस वर्ष बाद ! कट्टरवादी संगठनों द्वारा यह मुद्दा बनाया गया है। एक ब्लाग पर आया प्रश्न वाजिब है कि यह बात आयी कहाँ से ? उनके अनुसार इसे जानबूझकर कट्टरवादी संगठनों द्वारा एक मुस्लिम कलाकार को निशाना बनाया गया है। मेरा भी यही मानना है कि निश्चित ही इसके पीछे राजनीतिक और कट्टरवादी मकसद हैं। लेकिन एक और मूल प्रश्न यह है कि यदि हूसैन ने यह चित्र बनाया ही नहीं होता तो छब्बीस साल तो क्या छह सौ साल बाद भी ऐसा कोई मुद्दा नहीं बनाता। सही-गलत, देर-सवेर, स्वाभाविक-साजिश आदि के प्रश्न और विवरण तो आनुसंगिक हैं, प्रकरण बनता तो वहीं से है जहाँ से हूसैन ने यह चित्र बनाया। जहाँ तक बात मुस्लिम कलाकार को निशाना बनाने के मकसद की है तो देश में हूसैन ही तो अकेले मुस्लिम कलाकार नहीं है, या यही चित्र किसी हिन्दू ने बनाया होता तो क्या हिन्दू समाज इसे स्वीकार कर लेता? नहीं । हूसैन का बचाव कर रहे हिन्दू बौद्धिकों को भी तो विरोध झेलना पड़ रहा है। कट्टरवादी संगठनों का यह मकसद हो सकता है कि वे मुसलमान को निशाना बनायें, लेकिन मामला केवल इतना ही नहीं है। कट्टरवादियों के घृणित इरादों के मेल के बावजूद यह एक साधारण हिन्दू की आस्था पर चोट का मामला है। जो इसे मन से स्वीकार कर पाये या नहीं लेकिन उग्र तो नहीं ही होगा। एक प्रश्न यह भी है कि इस पर कलाकारों द्वारा, दर्शकों द्वारा भी आपत्ति नहीं है सिर्फ कट्टरवादी संगठनों द्वारा आपत्ति है। साधारण व्यक्ति की आपत्ति की पहचान क्या है ? देश मंहगाई से त्राहि-त्राहि कर रहा है, 100रु. कमाने वाला मजदूर भी बेचारा जाता है और परचूनी की दुकान से 40 रु. किलो की दाल खरीद लाता है। चुपचाप पकाता है, भूख काटता है अगले दिन फिर काम पर जाता है। तो क्या देश में मंहगाई नहीं है ? अब इसी मुद्दे पर राजनीतिक दल आन्दोलन करते हैं, बाजार बंद करते हैं सरकार के खिलाफ प्रदर्शन करते हैं तो निश्चित ही वे अपने वोट बैंक लिये ऐसा करते हैं, अपना फायदा देखते हैं, सत्ता में आना चाहते हैं लेकिन क्या इससे मंहगाई का मुद्धा आम आदमी का नहीं रह जाता ? या देश में मंहगाई स्वीकार्य हो जाती है ? मुद्दे का मूल मुद्दे के भीतर मौजूद है तो यह बेमानी हो जाता है कि उसे उठाने वाले का मकसद क्या है, और वह कौन है। ऐसे लोगों को हतोत्साहित करने का तरीका यही है कि शीघ्र न्याय किया जाये, तस्वीर साफ की जाये। आप मंहगाई कम कर दीजिये मुद्दा बनाने वालों के राजनीतिक, कट्टरवादी या घृणित जैसे भी इरादे हों सब धरे रह जायेंगे। फिर सांस्कृतिक संगठनों का यह कर्तव्य भी है कि वे इन मुद्दों पर भी जागरुक रहें। हूसैन की आयु अधिक है, उन्हें कट्टरपंथ से जान का ख़तरा है तो वे पूरी तरह सहानुभूति के पात्र हैं लेकिन इससे लाखों-करोडों लोगों की आस्था का प्रश्न अनुत्तरित नहीं छोड़ा जाना चाहिये।

कुछ तीखे प्रश्नों का जवाब भी हूसैन को देना चाहिये। वे नख-शिख नहीं बनाते, चेहरे नहीं बनाते, पर गुप्तांग जरूर बनाते हैं, क्या वे इससे भी नहीं बच सकते थे ? या वे गुप्तांग को चेहरे से ज्यादा महत्त्वपूर्ण मानते है ? या गुप्तांग में कला संभावनायें (भावाभिव्यक्ति वगैरह) चेहरे से ज्यादा हैं ? इसका जवाब शायद “बस कला है” से अधिक कुछ नहीं दिया गया है। (चेहरे नहीं बनाना, यह निपुणता भी हो सकती है, और कलागत अकुशलता का आवरण भी, कोई भी कलाकार इसे समझ सकता है, इसके भी कुछ भावनात्मक कारण बताये जाते हैं क्या वे कारण गुप्तांग चित्रण पर लागू नहीं होते) खैर ! एक चित्रकार के रूप में हूसैन को पूरा अधिकार है कि वे क्या चित्र बनायें, कैसा चित्र बनायें, कब बनायें आदि। कला में प्रतीकों और बिम्बों का प्रयोग जरूरी ही नहीं बल्कि असल में कला ही यह है, लेकिन प्रतीकों और बिम्बों का निरूपण और भी ज्यादा जरूरी है। राजेन्द्र यादव के द्वारा बताया गया चित्र का संदेश कहीं भी कम नहीं होता यदि सरस्वती के गुप्तांग की रेखा नहीं उकेरी गई होती। चित्र उतना ही सम्प्रेष्य रहता। न हूसैन ने , न किसी कला समीक्षक ने यह बताने की जरूरत समझी है कि नग्नता का विशेष अर्थ क्या है? उसका कलात्मक उत्कर्ष क्या है ? यह नग्नता सरस्वती के साथ कैसे महत्त्वपूर्ण अर्थ ग्रहण करती है या कलागत ऊँचाई को पहुँचती है। हूसैन का जिम्मेदार नागरिक के रूप में यह भी कर्तव्य है कि वे अपने कला के प्रति कम से कम इतने सजग तो रहें कि वे किसी समाज की धार्मिक भावनाओं को ठेस न पहुँचायें। आखिर कला का महत्त्व भी सामाज में ही संभव है। अकेला व्यक्ति जानवर भी होता है और संत भी। और इन दोनों को ही सामाजिक मर्यादाओं की परवाह नहीं होती न ही इनके लिये उसका कोई अर्थ है। लेकिन एक सामाजिक व्यक्ति न तो जानवर के रूप में समाज को स्वीकार है न समाज का ऐसा संत हो जाना संभव है, समाज में घटने वाली घटनाओं से हर सामाजिक प्रभावित होता है। हूसैन के चित्र में खोट बताने वालों के लिये कहा जाता है कि यह उनकी तंगनज़री है, जब यह बात मैंने एक बातचीत में कही तो मुझसे पूछा गया कि तंगनजरी कैसे ? उनका बनाया गया गुप्तांग तो दिख रहा है, क्या गुप्तांग के अन्दर भी कुछ बना रखा है जो हमको नहीं दिखता इसलिये !!! जाहिर यह कटाक्ष है। इसके विपरीत कुछ कम मौजूं प्रश्न नहीं उठाया गया कि यह हूसैन की तंगनजरी है, इनका भी कम घृणित इरादा नहीं है। उनकी हिन्दू आस्था केन्द्रों पर चोट करने की और धर्म को जलील करने की मानसिकता है। अभिव्यक्ति की आजादी का आशय नहीं है कि कलाकार मुंह बिदकाये, गाल फुलाये या किसी को जीभ दिखाये। इस प्रश्न का उत्तर भी तलाशा जाना चाहिये। हूसैन का मामला इतिहास में पहला नहीं है, यह पहली बार नहीं कि किसी धार्मिक प्रतीक, चिह्न या स्थल के साथ छेड़छाड़ की गई हो। सैकडों मंदिर हैं, जहाँ लाखों मूर्तियाँ होती थीं जिनमें एक भी ऐसी नहीं मिलेगी जिसे खंडित नहीं किया गया हो। अभी तक लोग कभी अंबेडकर कभी गांधी की मूर्ति से तोड़फोड़ करते हैं। मंदिरों, मस्जिदों की दीवारों पर इबारत लिख जाते हैं वहाँ गंदगी फैंक जाते हैं। तो क्या वे सैनिक, वे असामाजिक तत्व भी कलाकार हैं जिन्होंने ऐसा किया ! उनकी कला को भी समझने की जरूरत है ? यह मानसिकता खत्म हो गई है, ऐसा मानना जल्दबाजी होगी। आखिर अभी तो तालिबान ने बुद्ध की प्रतिमा को उड़ाया था। अभी तो बाबरी मस्जिद को गिराया गया है। हूसैन की कारस्तानी इनसे कहीं ज्यादा कलात्मक है। एक अच्छा कलाकार होना अच्छा नागरिक होने की गारंटी भी नहीं है। धार्मिक आस्थावान मनुष्य के लिये उसके आस्था केन्द्र पूज्य होते हैं। पर यदि उसके सामने उन्हीं केन्द्रों का मखौल उडा दिया जाये तो या तो वह अपनी क्षमताभर हिंसक हो उठेगा या उसका मनोबल टूटने में क्षण भी नहीं लगेगा। वह असहाय होकर आत्मसमर्पण कर देगा। हूसैन पर इस तरह का आरोप गलत हो सकता है लेकिन इसकी पड़ताल होनी आवश्यक है। क्या हूसैन इसे स्वीकार करते हैं कि उन्होंने किसी की धार्मिक भावनायें भड़काने के लिये ऐसा नहीं किया, और यदि किसी की भावनायें आहत हुई हैं तो वे क्षमा चाहते हैं अपना चित्र वापस लेते हैं ? कोई भी व्यक्ति जो उदार हो, अपने स्थान पर चाहे कितना ही सही हो आस्था के प्रश्नों पर ऐसा एक क्षण में कर सकता है? हूसैन ऐसा नहीं करते हैं तो मामला उलझता है।

प्रश्न यह भी है कि आस्था क्या है ? भावना क्या है ? यह भड़कती कैसे है ? भडकती तो यह जरूर ताकत के बल पर ही है, सही पक्ष को दबाकर गलत पक्ष को संरक्षण देने से भी यह भड़क सकती है। और ज्यादा कट्टर पंथी जानते होंगे या उनके स्वार्थ। लेकिन आस्था क्या है, भावना क्या है? इसे कोई आस्तिक ही जान सकता है। नास्तिक दृष्टिकोण से इसे नहीं समझा जा सकता। इसके अवैज्ञानिक होने का तर्क भी आधा तर्क है। किसी भी आस्तिक व्यक्ति के पास कोई ऐसा साधन नहीं है कि वह किसी अन्य व्यक्ति से कह सके कि ईश्वर है। ठीक इसी तरह किसी नास्तिक व्यक्ति के पास भी ऐसा कोई साधन नहीं है जिसके बल पर वह किसी अन्य व्यक्ति से जोर देकर कह सके कि कोई ईश्वर नहीं है, उसकी आस्था को निर्मूल साबित कर सके। इसलिये स्वस्थ समाज में समान आस्थाओं वाले व्यक्ति अपने विचार साझा कर सकते हैं, अन्य को अपनी आस्था के विषय में बता सकते हैं लेकिन आग्रही नहीं होना चाहिये। न किसी आस्तिक को न नास्तिक को। किसी का मखौल उड़ाना तो निश्चय ही हिंसा है। उदाहरण के लिये मि. ‘अ’ के पिता शहर के चौराहे पर निर्वस्त्र खडे हैं तो इससे मि. ‘अ’ को दुःख होगा और कोई भी सामाजिक प्राणी उनके दुःख को समझ लेगा, लेकिन किसी छोछे मानवशास्त्री के लिये तो वे अपनी प्राकृतिक अवस्था में ही खड़े हैं, उसके लिये इसमें दुःख की कोई बात ही नहीं है। इसलिये अपनी आस्था अपने विचार के साथ इस तरह जीना चाहिये की अन्य को भी अपनी आस्था के साथ जीने का पूरा स्पेस मिले। धर्मनिरपेक्षता का सवाल भी इसी से जुड़ा है, संविधान के अनुसार हमारा राष्ट्र धर्मनिरपेक्ष है, अर्थात हमारी सरकारें धर्म निरपेक्ष होंगी, नागरिक अपने धर्म को मानने के लिये स्वतंत्र हैं, या नास्तिक हों। इस प्रकार किसी भी धार्मिक को इतना उदार होना चाहिये कि जितना वह अपनी आस्थाओं का सम्मान करता है उतना ही अन्य की आस्था और नास्तिकता का भी सम्मान करे। तब संविधान के अनुसार राष्ट्र धर्मनिरपेक्ष होगा। हिन्दू मान्यताओं के खिलाफ होने से हूसैन का चित्र एक आम हिन्दू की आस्था पर चोट करने वाला तो है ही।


कुछ लेखों में भारतीय और खासकर हिन्दू संस्कृति के उजले पक्ष पर और उसके खुलेपन पर जबरदस्त लिखा है, लेकिन दिक्कत यह है कि वे हूसैन के मामले में उसकी दुहाई-सी देते हैं। सच है हिन्दू शिवलिंग की पूजा करते हैं आप बनाइये कोई नहीं भड़केगा, रति प्रसंगों के कथाचित्र बनाइये कौन भड़कता है! लेकिन सरस्वती नंगी बैठी है, यह हूसैन ने किस पौराणिक आख्यान से लिया है, यह कहाँ का कथा प्रसंग है, इसे स्पष्ट करने की जिम्मेदारी उन्हीं की है। क्या उन्होंने कोई नया पुराण रचा है? उनका यह चित्र किसी शृंखला का चित्र नहीं है। एकबार, यदि हूसैन किसी पौराणिक कथा के अनुसार स्नान या रति प्रसंग में सरस्वती को नग्न उकेरते तो बात फिर भी गले उतर सकती थी लेकिन अपने स्त्युत्य रूप में वे नग्न बैठी हैं। क्या ऐसा इसलिये भी जरूरी हो सकता है कि तब नग्न अवस्थाओं में वे उनके हाथ में वीणा और पुस्तक न दे पाते और हिन्दुओं को पता ही नहीं चलता कि वे उनकी सरस्वती हैं तो भावना ही तथाकथित रूप से नहीं भड़कतीं, मकसद ही पूरा नहीं होता ? यदि इसके पीछे कोई प्रगतिशील विचार होता तो यकीनन वे सरस्वती के हाथ में किताब के साथ कम्प्यूटर भी देते। लेकिन मकसद यह नहीं था। हूसैन वादियों के शब्दों में कहा जाये तो सभ्यता की गाडी को उल्टी दिशा में खींचने की कोशिश है, सरस्वती हाथ में वीणा तो रखती हैं, किताब तो रखती हैं लेकिन वस्त्र नहीं पहनतीं यहाँ तक कि गुप्तांग को भी नहीं ढकतीं हैं। क्या यही प्रगतिशीलता है, यही कल्पना का आकाश है ? बात यह कि हिन्दू पुराणों के अनुसार शिव बैल की सवारी करते हैं, कोई कलाकार जितना अच्छा कला प्रदर्शन कर सकता हो वैसा चित्र बनाये, लेकिन कोई उन्हें गधे की सवारी करते हुए चित्र बनाये और कहे कि यह कला है, अभिव्यक्ति की आज़ादी है, तो यह छूट किसी को भी नहीं लेनी चाहिये। हाँ, यदि कोई शोध कर लिया गया हो कि सरस्वती कपडे नहीं पहनती थी, शिव गधे की सवारी करते थे तो उसको सामने लाना चाहिये। किसी के विश्वास के साथ खेलना कलाकार को तो शोभा नहीं देता। यह ठीक है कि हूसैन अपने चित्रों को लेकर गली-गली नहीं घूमते हैं, लेकिन वे गुफामानव भी नहीं है। उनके चित्रों का प्रचार-प्रसार होता है। और यदि ये कृति उन्होंने अपने लिये ही बनाई थी तो उसे छुपाकर रखते, होता तो यह तब भी गलत, लेकिन किसी को फसाद करने का मौका तो नहीं मिलता। इस पर क्या कहा जायेगा कि विवाद के बावजूद इस चित्र को एक प्रतिष्ठित पत्रिका ने छापा और सार्वजनिक किया। जब कट्टरपंथियों से उनकी असहिष्णुता की बात की जाती है तो उन्हें लगता है कि हूसैन का पक्ष लिया जा रहा है, हूसैन वादियों से तो प्रश्न करना ही कट्टरवादी होना है। अज़ीब विडम्बना है।

पैगम्बर साहब का चित्र बनाने की बात कहना गलत है, जो आप अपने साथ नहीं चाहते किसी अन्य के साथ भी क्यूँ चाहते हैं यह सरासर असहिष्णु बात है, और यह माँग करना भी हूसैन के अपराध से कम अपराध नहीं है, बल्कि इसके खिलाफ भी कानूनी कार्यवाही की जानी चाहिये। लेकिन एक प्रश्न हूसैन का बचाव करने वालों से जरूर है। हूसैन यदि हिन्दू-मुसलमान की परिधि से बाहर आ गये हैं, वे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सदुपयोग कर रहे हैं, रंगों और रेखाओं के अद्भुत चित्रकार हैं(जो कि हैं ही) तो एक चित्र बनाकर इसका प्रमाण दे ही दें और मामले को खत्म करें, क्यूँ कट्टर पंथियों को इतना बोलने और हावी होने का मौका दे रहे हैं। या उनकी तरफ से कोई प्रवक्ता करदे। हमारे देश में ऐसे खिलाड़ी रहे हैं जो दर्शकों की माँग पर छक्का लगाते थे। चित्रकार के लिये तो किसी मांग को पूरा करना और भी आसान है क्योंकि उसे किसे बॉलर का सामना नहीं करना होता, गैंद और बाल दोनों उसी के हाथ में होती हैं। स्वयं हूसैन किसी और की इच्छा से हिन्दू कथाओं पर चित्र बनाते रहे हैं। क्या नहीं हो पायेगा? (वास्तव में यह प्रश्न न मेरा है और न मैं चाहता हूँ कि हूसैन साहब मुस्लिम भावनाओं के साथ भी खेलें लेकिन यह एक खीझ है जो इस तरह सामने आती है, मुसलमान कब कहते हैं कि हूसैन ने सरस्वती का नग्न चित्रण कर कोई अच्छा काम किया है! कोई भी धार्मिक व्यक्ति आस्था और भावना को समझ सकता है। यह प्रश्न मूल प्रश्न नहीं है बल्कि हूसैनवादियों के अतिवाद से उपजी खीझ है। यदि ये वास्तव में ये कट्टर या असहिष्णु प्रश्न होता तो मुझे लगता है कि कट्टरवादियों में कुछ कलाकार तो होंगे ही जो इसे कर दिखाते? ठाकरे भी कार्टूनिस्ट तो हैं ही। कहा जाता है कि हूसैन ने ही महाभारत और रामायण पर पेंटिंगस् की एक पूरी शृंखला बनायी किसी अन्य चित्रकार या हिन्दू चित्रकार ने ऐसा नहीं किया। इसका भाष्य कैसे किया जाये ! क्या हूसैन ने अपनी पेंटिंगस् का जो विषय चुना उसमें उनका कोई हित नहीं था या हिन्दू समाज पर किये गये एहसान का बदला वे सरस्वती का नग्न चित्रण कर वसूल रहे हैं ?

हूसैन बहुत बड़े कलाकार हैं, यही तर्क इतना बडा हो गया है कि वे प्रश्नातीत हो गये हैं, उत्तरातीत होना तो उनके हाथ की बात है। उन्हें अपनी कृति की व्याख्या भी तो करनी चाहिये, आखिर प्रश्न हूसैन या उनकी कला पर नहीं एक खास चित्र और उसे लेकर हूसैन के इरादों पर ही हैं, क्यूँ उसकी परिधि को बढ़ाया जाता है? क्या बहुत निपुण अकाउण्टैण्ट गबन नहीं कर सकता है ? क्या उसके खाते ऑडिट से बाहर होने चाहिये ? ठीक है अकाउण्टैणट द्वारा की गई बारीक गडबडियाँ तो कोई अकाउण्ट का जानकार ( अर्थात कलासमीक्षक, आलोचक) ही बता पायेगा लेकिन उसने जगह-जगह ओवरराइटिंग की है, काट-छांट की है, अंक बदल दिये हैं यह तो साधारण साक्षर आदमी भी बता सकता है। हूसैन वादियों से, जो अश्लीलता सिर्फ देखने वाले की आँखों में बताते हैं , से एक अश्लील प्रश्न एक उदाहरण के जरिये पूछ लेना उचित होगा। यदि मि. ‘अ’ बहुत उच्च कोटि के अभिनेता हैं वे अभिनय में इतने डूब जाते हैं कि खुद को भूल जाते हैं। नाटक में कोई रति प्रसंग है तो क्या मंच पर वह अपनी साथी कलाकार के साथ वह कला प्रदर्शन कर सकते है? यह भी खीज़ है लेकिन इससे तुरंत समझ में आ जाता है कि अश्लीलता क्या है ! या इस प्रसंग को संकेतों, प्रतीकों, स्थितियों, बिम्बों के माध्यम से दिखाना चाहिये। क्या इस कला प्रदर्शन की कोई सीमारेखा नहीं होगी? यह कहानी हो सकती है लेकिन बचपन में सुना था की आला-उदल की नोटंकी में एक कलाकार ने भावावेग में मंच पर सचमुच ही साथी कलाकार को कटार भोंक दी और अभिनय में डूबा रहा। पुलिस आयी और गिरफ्तार कर ले गयी। बहुत अच्छा मूर्तिकार कल गाँधी जी की, अंबेडकर साहब की नग्न मूर्ति चौराहे पर लगा देगा तो क्या यह भी समाज को स्वीकार कर लेना चाहिये। जिसकी भारत के लोकतंत्र में आस्था हो वह क्या तिरंगे के अपमान से भी दुःखी नही हो। क्या वहाँ भी आस्था का प्रश्न खारिज़ किया जा सकता है ? इस बाबत संविधान माफ करता है ?

एक लेख में कुछ वैज्ञानिक क्रांतियों और समाज सुधारों का ज़िक्र किया है और उनके बाबत् की गई कट्टरवादी कार्यवाहियों और समाजसुधार के मामले में स्वीकार्यताओं का उल्लेख भी किया है। उन्होंने ब्रूनो, गैलिलियो और दयानन्द सरस्वती का जिक्र किया है। उदाहरण बडे सटीक हैं और कोई भी बर्बर कार्यवाही हूसैन के साथ हो तो यह आधुनिक समाज में कहीं ज्यादा शर्मनाक स्थिति होगी। अब तो समाज का वैज्ञानिक आधार भी काफी सुदृढ़ है। लेकिन मेरा प्रश्न थोडा भिन्न है। साफ प्रश्न यह है कि इन मामलों से हूसैन की तुलना का कोई संबंध नहीं है। न तो हूसैन ने कोई वैज्ञानिक खोज की है, न उन्होंने कोई समाज सुधार का कार्य किया है, न अंधविश्वास से पर्दा उठाया है। आखिर किस तरह से हूसैन का मामला इन उदाहरणों से मेल खाता है? उन्होंने सिर्फ आस्था से खिलवाड़ किया है। क्या वे चित्र के जरिये मानव समाज को दिशा देना वाला यह जरूरी सत्य उजागर करते हैं कि सरस्वती कपडे नहीं पहनती थी। क्या कपडे पहनी हुई सरस्वती की आराधना की तुलना में नंगी सरस्वती की आराधाना अधिक वैज्ञानिक और तर्क संगत है ? क्या वे यह कहना चाहते है कि सरस्वती अपना यौवन दिखा कर शेर को रिझा रही हैं ? इस चित्र के जरिये उन्होंने किसी प्रकार का कोई प्रगतिशील विचार समाज को नहीं दिया सिवाय चिकोटी काटने के? इससे बेहतर तो यह होता कि वे देवी-देवताओं के अस्तित्व पर प्रश्न उठाते, मूर्ति पूजा पर प्रश्न उठाते, तो यह दर्शन की बात होती।

कट्टरवादी हिन्दू संगठनों को हिन्दुओं पर कृपा करनी चाहिये और धार्मिक मसलों को राजनीति का औजार नहीं बनाना चाहिये। इससे वे हिन्दू का हूसैन की तुलना में लाख गुणा अहित करते हैं, हिन्दू हूसैन के चित्र के बजाय कट्टरवादी हरकतों और असंयमित प्रतिक्रियाओं से लाख गुना अधिक शर्मसार होता है, इसलिये हिन्दुओं को अपने इन अतिवादी संगठनों पर लगाम लगानी चाहिये। क्या हूसैन के विरोध में उनके पास कोई संविधान सम्मत कार्यक्रम नहीं है, इनके भी अलोकतांत्रिक बयानों और तोड़फोड़ पर सज़ा सुनिश्चित होनी ही चाहिये। वे देश के कानून पर भरोसा नहीं करते। प्रदर्शनियों में तोड़फोड़, जान से मारने की धमकियों से क्या वे यह साबित नहीं कर रहे कि वे वास्तव में नंगे ही हैं?

और हूसैन पर यह जिम्मेदारी तो बनती है कि वे हिन्दू समाज को बतायें कि इस चित्र के पीछे उनकी दुर्भावना नहीं थी। और यह केवल उनके वक्तव्य से नहीं, कुछ तीखे प्रश्नों पर उनके जवाब से तय होना चाहिये, लेकिन अब देश के पास यह अवसर नहीं है क्यूँकि हूसैन अपनी कारस्तानी कर उडन-छू हो गये हैं।

मेरे विरोध का तरीकाः-

सुनो पार्टनर

चौराहे पर कोड़े तो नहीं मारे जाते

लेकिन कुछ ख़तरे अभी भी हैं

सीधे-सीधे गुण्डई में

इसलिये हम इसे

कविता के, कहानी के, चित्र और पेंटिंग के

अर्थात कला के बहाने करते हैं

10 comments:

आयुष said...

हुसैन जैसे कुत्सित और कट्टर व्यक्तियों पर आपने इतने पन्ने जाया कर दिये.एक आदमी समाज में वैमनस्ता फैलाता है और लोग इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कहते है़. अगर यह सही है तो नार्वे के कार्टूनिस्ट द्वारा बनाया गया अली साहब का कार्टून भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की श्रेणी मे ही ना आयेगा ? फिर उस पर इतना बवाल क्यों? एक ने किया तो उसका सर कलम कर दो , पर दुसरे ने किया तो कलाकार ? सिर्फ इस लिये कि उसने इस्लाम का किया, पर इस व्यक्ति ने हिंदु देवी का किया. इसलाम कि निंदा नही हो सकती पर बाकी धर्मों की हो सकती है.
अगर इसे कला ही दिखानी है तो क्यों नहीं अपनी मां की नग्न चित्र बना कर कला का नमूना दिखाता है? अगर इस तरह का आदमी यहां की नगरिकता छोडकर किसी दुसरे देश ( कतर) की नागरिकता ले लेता है तो वह इस देश का भला ही कर रहा है.
यह बात दीगर है कि वह यह सब कुछ अपने टैक्स के पैसे बचाने के लिये कर रहा है.( कतर मे नागरिक टैक्स नही है).माधुरी , अमृ्ता जैसियों के पीछे पैसे उडाने वाले इस लोलुप, कामांधी व्यक्ति से और क्या आशा के जा सकती है.

L.R.Gandhi said...

हिन्दू समाज की यह एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया है। एक ओर तो शैतान की आयतें बिना पढ़े ही प्रतिबंधित की जाती हैं ,तस्लिमान को इसी सेकुलर भारत से बेदखल किया जाता है, एक विदेशी कार्टून पर इतना हंगामा अब तसलीमा के नाम पर बुरका विवाद ...सैकुलार वादी सरकार की तुष्टिकरण नीति और नियति से हिन्दुओं में प्रतिक्रिया स्वाभाविक है। हुसैन के लिए रुदाली हुए जा रहे बुद्धिजीवी क्या अपनी माँ बहिन या बेटी की ऐसी ही काला कृति अपने ड्राइंग रूम में लगा पाएंगे। आपका लेख बहुत सार गर्भित और तथ्यपरक है.....धन्यवाद।

Varun Kumar Jaiswal said...

इस विषय पर अब तक का सबसे उम्दा लेख |
धन्यवाद |

Fauziya Reyaz said...

main waise to naa hussain ko ghalat samajhti hun nahi taslima ko magar...aapke prashan ya kisi musalman ke taslima ke liye prashan bhi sahi hain....sawal jawab isliye bhi nai ho paate kyunki rajnitik partiyan ye mauka hi nahi aane detin

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

निश्चित ही हुसैन कलाकार हैं, वे उत्कृष्ट हैं या नहीं यह बताना तो समीक्षकों का काम है। उन से भी उत्कृष्ट कलाकार भारत और विश्व में मौजूद हैं। लेकिन उन का इतना चर्चा नहीं होता, वे अचर्चित रह जाते हैं। यह एक फार्मूला है की किसी को गाली दो, किसी को अपमानित करो, कोई निरर्थक विवाद पैदा करो और चर्चित हो जाओ। विवाद पर चुप्पी साध लो। बहुत लोग इस फार्मूले का उपयोग करते हैं, कट्टरपंथी भी। दोनों समान रूप से दोषी हैं। हुसैन प्रगतिशील नहीं हैं। वे कला के व्यापारी हैं। वे भारत छोड़ कर चले गए यही उन की नियति थी। लेकिन अब जब वह छोड़ कर चले गए हैं तो किस बात का हाय-तोबा है?
इस आलेख के लिए शुक्रिया। बहुत संयत आलेख है।
मेरा तो मानना है कि ये सब विवाद इस लिए उठाए जाते हैं कि लोगों का ध्यान उन मूल समस्याओं से हट जाए जो उन्हें संगठित कर सकती है और मौजूदा व्यवस्था के लिए संकट खड़े कर सकती है।

वन्दना अवस्थी दुबे said...

अश्लीलता हमेशा अश्लीलता ही रहेगी, उसे कुछ भी कोई भी नाम देकर श्लील नहीं किया जा सकता, फिर चाहे वे हुसैन हों या राजा रवि वर्मा. विचारोत्तेजक लेख.

Babli said...

बहुत बढ़िया लिखा है आपने जो काबिले तारीफ़ है! इस उम्दा पोस्ट के लिए बधाई!

प्रीतीश बारहठ said...

कृपया, असंयमित भाषा, जैसे माँ-बहन का चित्र आदि का प्रयोग न करें। बिना आवेश में आये विवेक सम्मत विचार प्रगट करें।

विनम्र अनुरोध है

O.L. Menaria said...

आपके लेख में सनातन धर्म की उदात भावनाओं का निर्वाह करते हुए बहुत ही संयमित ढंग से हुसैन वादियों एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्षधरों की ऑंखें खोलने का सार्थक प्रयास किया है.हुसैन पर बहुत ही संजीदा एवं उत्कृष्ट लेखन पर बधाई.

निशांत मिश्र - Nishant Mishra said...

चित्रकला और अभिव्यक्ति के गहरे अर्थों को टटोलता हुआ शोधपूर्ण आलेख.